Saturday, April 4, 2015

वो लड़की

मुझे
वही लड़की
पसंद  है.
जो फूल नहीं,
सुगंध है.
वही जो कभी,
ख़ूब बोलती
है मुझसे,
और कभी
चुप हो जाती है
कई दिनों तक.
यह वही
लड़की है.
जो बिल्कुल
मेरी ही
जैसी है,
मानती है
इस बात को
और मान कर
मानना नही,
चाहे कभी.

लड़की जिसे
देखकर
मेरे साथी
बोलते हैं
मेरे पीछे-
यही है वो?
मैं चाहकर भी
उसका हाथ
थाम के
कह नहीं
पाता हाँ यही.
वो मुझे कहने
नही देती.
जाने कौन
सा संकोच
उसको रोकता है?
मुझे देखती है,
सराहती है,
सोचती है.
साथ अपने
रहने नहीं देती.

जो उदास
होती है
तो मौसम
बोझिल सा,
लगता है मुझको.
जो अपने
आप मे,
मौसम ही है
मेरे लिए.
ज़रा सी धूप
सुबह सुबह की
गुनगुनी,
रिमझिम बरसती
पहली बारिश
की सोंधी
महकती सी नमी.
इंद्रधनुष मे
ना समेटे जाएँ
इतने अनूठे रंग.
मुझे कुछ
नही चाहिए  बस 
उसका सानिध्य
उसका संग,
किंचित गहरा 
तनिक अंतरंग.

लड़की जो
अपने आप में
संपूर्ण है.
इसलिए नहीं
वो मेरी चाह
मेरी पसंद है.
इसलिए कि
वो पूरा होने
का ढोंग नहीं
करती औरों
की तरह.
वो जूझती है
हार को तय
जान कर,
उबार लेती है,
अपने आस पास
के संबंधों को.
जो अजाने ही
डर डर कर
उसे भयभीत
कर जाते हैं.

लड़की जो
अपनी उम्र
से बड़ी हो
गयी किसी
दिन अकस्मात.
जो उलझी हुई
थी अपनी
उधेड़बुन मे.
जो बँधी रही
नियति और
नियमों मे
अनचाहे प्रबल
बंधन मे.

मुझे क्यों
वही दिखी
उसका पीड़ा
उसका दमित
संघर्ष नही?
मैं क्यों
उसके हँसी पर
ही मुग्ध रहा,
उसके अंतर के
मनोभाव नहीं
पढ़ पाया.
मैं क्यूँ
अपनी पिपासा
से आगे
चाहकर भी
नहीं बढ़ पाया.

सच है
सपनों मे
पाता हूँ
उसे अपने.
मेरा बस
नहीं चलता
उन पर.
यथार्थ में
मैं उसके
स्वप्न जीना
चाहता हूँ
मुट्ठी भर.
अपने प्रेम को 
नहीं रखूँगा
स्वयं से
बाँध कर
खुद में
ही समेटकर.
इस स्नेह-संबंध में
मैं उसे
मुक्त करना 
चाहता हूँ.

शिशिर सोमवंशी

Monday, March 16, 2015

दुविधा

ये तन मेरा
मुझे छोड़ के
चल देता है,
मैं बेबस रह
जाता हूँ.
रेंगता घिसटता,
इसके पीछे.

मेरा मन
हाथ खींचे,
रोके मुझको.
मैं दूर से
देखूँ ख़ुद को,
निरुद्देश्य,
भटकते हुए
बात करते,
स्वयं को
समझने समझाने
के यत्न मे
तल्लीन.
कितना लचर
कितना लाचार.

आस बँधती है,
कोई लगता है
आता हुआ,
रुकता हुआ,
अपने  जैसा.
आता है,
सुनता है,
समझता भी है.
साथ भर,
रह नहीं पाता.

उसके मिलने के
उत्साह मे
मेरा तन
पिघल जाता है,
थोड़ा ज़्यादा.
बोल जाता है
अपनी सीमा
से ऊपर.
कुछ उथला,
कुछ हल्का,
कहीं कृत्रिम.
मन दूर खड़ा,
देख कर भी,
रोक नही पाता.

जिसने देखा मुझे,
जब भी देखा,
जितना देखा.
तन ही देखा,
तन ही समझा.
मन को बेदाग़
रखने के प्रयास,
उहापोह और
उलझन मे,
मैने इस बार
भी तुमको
देखा है.
क्या तुम
तन को
परे रखकर
मेरे मन को
देख पाओगे?

मन का ना
हो पाने की
पीड़ा घनी                      
हो उठती है
कोई समय
नही इसका.
सतत कमी के
आभाष मे
जीवित रहना
अपने तन के
प्रपंच सहना,
भारी होता है.
क्या तुम
मेरे मन का
तनिक सा
बोझ उठाओगे?


शिशिर सोमवंशी



Friday, February 20, 2015

वह एक दिन....

जिस दिन
इन्हीं हाथों से,
फिसली थी
आशा की
अंतिम किरण.
और शैशव
के धृष्ट
उत्साह ने,
किनारा किया.
ठीक से
याद नहीं,
आज जैसा ही
लगता था-
थोड़ा तन्हा
उदास
बेमतलब.

अपरिचित
उल्लसित स्वर,
संगीत की
ध्वनियाँ,
गूँज कर
बुझ गयीं,
मेरे आस-पास
बेमतलब.
जैसे बेजान
ज़िस्म मे,
चलती थी
सांस बेमतलब.

नींद खुलने
पर घबरा जाऊं
पास उसको
नहीं पाकर
वो जो उतरा था
चुपके से-
मेरे चेहरे पे
मेरी आँखों मे.
देर तक उनमे
रोशनी ढूँढे,
ये अंधेरा सा
ख्वाब बेमतलब.
रोज़ ऐसे ही
बीत जाया करे,
ज़िंदगी जैसी ये
रात बेमतलब.

-शिशिर सोमवंशी