Sunday, August 10, 2014

मेरे हिस्से की धूप

बिना संकोच,
निर्भय होकर 
माँगूंगा इसी पल से
बस आज से.



मेरे हिस्से की धूप,
नमी और हवा.
ये दिन भी बीत
जाएगा नही तो,
उमर की तरह
धीरे धीरे ऐसे.

मेरी कहानी,
जल्दी से पढ़ दी
हो किसी और ने
बेमन से जैसे.


- शिशिर सोमवंशी

जब होगी सुबह












जब होगी सुबह,
तुम रख लेना,
अपने हिस्से सारी सारी.

इस डूबती बोझिल,
सांझ को तुम,
मेरे नाम करो.
तुम जी लोगे...
मैं जी लूँगा.
तुम जीवन हो,
मैं जीवन हूँ....

कोने कोने जो,
बिखरा है,
साथ हमारे रहता है,
और काल सरित,
मे बहता है..

इस अमृत की बूँदें सारी,
तुम पी लेना,
मैं पी लूँगा.
तुम जीवन हो,
मैं जीवन हूँ
.

- शिशिर सोमवंशी

मेरे जीवन ना मैं चंदन










मेरे जीवन ना मैं चंदन

फिर भी घिस करके अपना तन

तेरे माथे तिलक लगाऊं

तू शीतल हो जाए-


रुक जाऊं, सुस्ताऊं

बात पुरानी याद करूँ

थोड़ा रो लूँ या मुस्काऊँ

ऐसा कोई पल हो पाए.


काया के इस 

मलिन रूप को,

सांझ उतरती हुई

धूप को,

रह रह कर सुलगाऊँ

संभव कोई छल

हो जाए.


-शिशिर सोमवंशी

बस एक बार

एक बार 
बस एक बार
मुझे उन आँखों मे
ठीक उसी तरह
दिखना है..

जैसे पहली बार
देखा था.

उतना भला मैं
कभी नही लगा.
और...
उतना साफ भी.

समय के प्रवाह ने
उन्मुक्त निश्चल
जल को बाँध ही
लिया अंतत:


स्मृतियाँ तो मुक्त हैं
विश्वास करो..
मैने इन्हें कुछ
नहीं बताया,
कुछ भी नहीं कहा.


-शिशिर सोमवंशी

अभी और जीने का मन है

मरुथल से शुष्क यथार्थ और 
प्लावित व्यावहारिकता 
के मध्य दम घोंटते 
नीरव एकाकीपन से....
थकी साँसों को जागृत और
जीवन से स्वत: किए 

पुराने अनुबंध को स्मृत कर-
मैं लौट आया हूँ
अपनी अकिंचन दुनिया मे-
सबके लिए- अपने लिए...
कि अभी और जीने का मन है।

अपेक्षा- अनापेक्षा,
प्रतिस्पर्धा और पश्चाताप
की धूल कस के फटक
अनुराग- विराग,
हर्ष और प्रलाप
को परे झटक
विगत की गणित को विस्मृत कर-
मैं लौट आया हूँ
अपनी अकिंचन दुनिया मे-
सबके लिए- अपने लिए....
कि अभी और जीने का मन है।


-शिशिर सोमवंशी (१ जनवरी २०१४)

Saturday, August 9, 2014

मैं यायावर

मैं बीते समय का यायावर,
बस राहों में सुख पाता हूँ.

स्मृतियों की धूल लिए
रुकने के सारे आमंत्रण-
स्थायित्व के अनुपम क्षण-

पुनर्मिलन के मधुरिम प्रण
आग्रह से ठुकराता हूँ.

मैं अपने ही सम्मोहन में
अपनी निजता के बंधन में
जीवन के अद्भुत मंदिर में
क्षय होती जाती काया के-
आदर से पुष्प चढ़ाता हूँ.

मैं बीते समय का यायावर,
बस राहों में सुख पाता हूँ.

-शिशिर सोमवंशी

मैं आराध्य नहीं

प्रिये मैं आराध्य नहीं 
अपनी समस्त दुर्बलताओं में 
सिरे से अंत तक उलझा हुआ- 
उन्हे समझता और स्वीकारता 
मनुज हूँ 

मन हूँ.

तुम भी तो समझो
कच्ची-पक्की मिट्टी की
मूर्ति हूँ-
जो जस तस बन गयी
उस आँच मे
जो भी जीवन की गति में
मेरे हिस्से पड़ी.
अपेक्षाओं की कसौटी
कसते कसते टूटा तो?
भन्गुर हूँ
अकिंचन हूँ.

ये कैसा प्रेम है?
जो सतत बदलाव की
प्रत्याशा मे जीवन के
पूर्व से ही रीते पात्र
को ही उलट देना चाहे?
कैसा प्रेम है?
जो हर घटना
हर गतिविधि पर
पहरे बिठाए और सहम जाए.

प्रियपात्र का
वर्जनाओं से सर्वथा मुक्त होना
दुष्कर है
और दुरूह है हर आशा का
अपेक्षित परिणाम.
संबंधो में-
हम सब सहते हैं,
बँधते हैं,
सुलगते हैं
और शांत भी होते हैं
मर्यादा कमजोर क्षणों मे
इनसे विलग होने के
प्रयास की है.

हाँ मेरे अपराध
दो पृष्ठ अधिक,
हाँ मेरा भटकाव,
कुछ मोड़ आगे तक.
मेरी.................छोड़ो-

मेरी मान्यताएँ, मेरे मूल्य
कहीं निजता और
कहीं सहजता.
मेरा व्यतीत और मेरा अतीत
मेरी श्रद्धा, समर्पण
और मौन समर्थन....
कितने सर्प लिपटे रहे
और कभी लगा ही नही
मैं चंदन हूँ.

दिल इतने बड़े क्यूँ हों?
कि उनमें ज्वार उठते रहें
साँसें उफन जाएँ
क्यूँ अनायास यूँ ही
और ज़रा सी बात पे
घुटती रहें कई रातों तक?
प्रेम? नही हूँ बस
साहचर्य के सुखों का उल्लास
दुखों का विषाद
नितांत सरल स्थितियों की
अप्रत्याशित परिनिति का
अनसुना स्पंदन हूँ.
क्या कम हूँ? 

-शिशिर सोमवंशी२३-०४-२०१४ सुबह के नौ बज गये इस प्रलाप में.