Friday, October 21, 2011

शोर

क्या कहूँ?
कितना सुनूं?
किसकी सुनी
समझा नहीं;
तो भी कहूँ,
सीखा अतुल
समझा बहुत.
पर प्रश्न मेरे,
हरदम रहे,
चुप-चाप; एकल,
अनुत्तरित.

यह शोर सब,
शब्दों मे ही,
बहता रहा.
हर ओर से,
हर छोर से,
कोई ना कोई,
कुछ ना कुछ,
बोला किया,
कहता रहा.
एक एक निमिष
अनवरत.
जीवन सतत्.


शिशिर सोमवंशी

Monday, September 26, 2011

आओ लौट चलें

वो शांत वृक्ष/
उनके गहरे हरे पत्ते/
पसरी हुई पगडंडी पर/
रह रह के उभर आते/
वो बैंगनी से फूल/
खिल खिलाती नदी/
और उसकी धार में/
गुदगुदाहट से/
हंस हंस के लोटते/
गोल सफेद पत्थर.....
उन्ही पतों पर/
वहीं रहते हैं.
उसी तस्वीर मे/
हर रूप- हर रंग मे/
बसते हैं अभी.




आओ लौट चलें/
कि वो भागे नही/
हमारी तरह/
हम से कहते हैं/
माँ ने बच्चों के घर/
लौट के आ जाने पर/
कुछ कहा है कभी?

-शिशिर सोमवंशी
[देहरादून से दिल्ली की शताब्दी रेल से यात्रा मे २४ सितंबर २०११.]

Thursday, September 1, 2011

लिफ़ाफ़ा


मैंने कई बार कहा
मैं उजला,साफ़ काग़ज़,
मुझ पर लिखो
कुछ ऐसा जो
कोई देखे, सराहे और
सहेज़ कर रखे.
जैसे सदियों की बचत;
मेहनत की ख़री पाई.

समय ने किस की सुनी,
मैं बन के रह गया
एक ऐसा लिफ़ाफ़ा
जिस पर
जिसका जो मन आया,
वैसी क़ीमत का,
टिकट चिपका दिया;
और ऐसी मंज़िलों का,
पता घसीट दिया;
जो मेरी न थीं.

जहाँ लिफ़ाफ़ा तो
पहुँचता रहा....
मैं नही-
इतने बरसों मे,
इतने सालों मे,
मेरी बारी ही थी;
जो नही आई.

इसको पढ़ना और
भूल जाना तुम,
दिल पर अपने,
न बोझ लाना तुम,
ज़िंदगी बीता करती है
कई बार यूँ ही-
अपने मन का ,
नही होता हरदम.

आज फिर हंस के
निकलने का दिन है
राह मे बिखरें हैं;
वो नही मोती-माणिक
काँच के टुकड़े हैं;
चुभती है तो क्या-
ख़ुद के सपनों की
ये कमाई.

-शिशिर सोमवंशी

Tuesday, August 16, 2011

तुम्हारी आखों मे मेरे रंग


मैं वही तस्वीर हूँ,
जिसे बनाते बनाते,
तुम्हारा मन उचट गया.
रंग वहीं आस पास थे,
तुन्हे दिखने बंद हो गये.
कोई रंज़ नहीं;
जो मैं पूरी न हुई.
जो पूरी ही हो जाए-
वो ज़िंदगी कहाँ?

ये जो भी है,
झूठी-सच्ची, कच्ची-पक्की..
और अधूरी सी सही-
तुम्हारी है.

एक बात कहूँ तुमसे?
कुछ देर को रंगों,
की तलाश को भूल,
कूची को किनारे कर,
अपने हाथों से:
बना दो मुझको.

सजाओ इतना ही-
कि सह सकूँ मैं भी;
जो यह बदरंग है;
धूमिल सा है-
मेरा अपना एक,
रंग ही तो है
चीज़ अपनी है-
मुझे प्यारी है.

-शिशिर सोमवंशी

Wednesday, July 27, 2011

तुम और मैं


वो भी तुम्ही हो/
ग्रीष्म की/
तप्त दोपहर/
जो बीतते बीतते/
देर तक ठहरी/
बिना आमंत्रण अनायास/
चुपके से चली आई/
और शीतल कर गयी/
वो सांझ-
तुम्ही हो.

चमक कर/
फैली हुई/ये धूप/
तुम्ही हो/
झिझक कर/
सिमट गयी/
थी जो रात.

तुम्ही हो/
हर रंग/
हर घटना/हर मौसम;
मेरा बसंत भी/
शिशिर भी/
मेरी भटकन/
मेरी मुक्ति;
अतीत, व्यतीत/
और वर्तमान/
मुझमे घुला/
सब रस/
मुझसे बँधी/ हर बात.

तुम्ही सब कुछ हो-
मैं तो बस/
वो समय हूँ;
जो तुम्हे छू कर
यूँ ही निकल गया;
क्यूँ कहते हो कि-
मैं बदल गया.

शिशिर सोमवंशी

Sunday, July 24, 2011

सोमवार का स्वर

कई बार खोने मे,
प्राप्ति सा सुख होता है.
बहुत बार पा कर भी,
तृप्ति का आनंद नही.

वचन जब शब्द हों-
वार्ता औपचारिकता.
मिलना एक रस्म सा,
बिछड़ना भाव-विहीन.
आँखें देख लेती हैं-
जाने क्या क्या.
दिल से नही कहतीं-
कि दुखी होगा नासमझ.
संजोता है संबंध
परखता नहीं.

मैं लौट आया हूँ;
नीरव एकांत के दिनों से,
छला जा कर,
चुपचाप उसी मेले मे,
गुम हो जाने को.
जिसमे अपनी भी
झलक मिलती नहीं.

मैं सुखी हूँ-
कि मैं यहाँ हूँ-
इस सब के बीच,
जीवन के छोटे छोटे
सुखों मे सिमट के-
और व्यर्थ के दुखों को,
पोस कर, सहेज कर.
खुश हूँ कि ज़िंदा हूँ-
ऐसी ज़िंदगी तो
सब को मिलती नही.

-शिशिर सोमवंशी

Monday, June 13, 2011

प्रतिरोध

बंद कमरे मे भी,
पता चल रहा है-
कि शाम उतर रही है,
बाहर खिड़की के,
पर्दों के पीछे,
धीरे धीरे.

सुबह से ही था,
थक गया मन-
तन चलता रहा,
घड़ी के साथ,
धीरे धीरे.

बहुत हुआ जितना सहा,
मैं भी उठकर,
हटा ही दूँगा-
इन पर्दों को,
काँपते हाथों से,
धीरे धीरे.

बाहर जो बिखर रही है,
उस ख़ुश्बू की ख़ातिर,
या पल पल ठंडी होती,
हवाओं के लिए?
बात ऐसी भी नही.

बहुत देर उजाले को,
रोक कर रखा,
अब अंधेरो को,
रोक लूँ-
कहाँ धीरज बचा-
कहाँ सामर्थ्य रही.

-शिशिर सोमवंशी