
आज पुन:
हर बार की तरह,
आत्मा को कंधा देकर,
देह को वापस लिए,
लौट चले.
अब और एक-
पुनर्जन्म का स्वप्न
पाल कर,
अपनी देह मे जीवन
को जगाना है...
अगले स्वप्न की
मृत्यु तक.
ओह इस व्यथित
मन को...
कितना छलें.
-शिशिर सोमवंशी
जीवन की जिजीविषा की अभिव्यक्ति; कविताओं के भाव, परिस्थितियाँ और सन्दर्भ मेरे हैं- आपको अपने लगें तो लिखना सार्थक......... नही तो अनर्गल शब्दों की गति.
