Sunday, March 4, 2012

और एक पुनर्जन्म


आज पुन:
हर बार की तरह,
आत्मा को कंधा देकर,
देह को वापस लिए,
लौट चले.

अब और एक-
पुनर्जन्म का स्वप्न
पाल कर,
अपनी देह मे जीवन
को जगाना है...

अगले स्वप्न की
मृत्यु तक.
ओह इस व्यथित
मन को...
कितना छलें.

-शिशिर सोमवंशी

Monday, December 5, 2011

तुम्हारे साथ


तुम्हारे साथ,
मैं हूँ भी
और नही भी,

तुम्हारी भाषा
सुन
रहा हूँ मैं.

और समझ रहा हूँ
तुम्हारी कही भी..

कहने से सुनना,
और सुनने से
समझ जाने मे..

सुख है,
सार्थकता है.

रिश्तों मे अधूरेपन मे ही...
उनकी संपूर्णता है.

अधूरा हूँ,
जीवित हूँ..
हर पल पूरा हो रहा हूँ.

मिठास सा
घुल रहा हूँ

कौन कहता है
चुक रहा हूँ मैं?

Friday, October 21, 2011

शोर

क्या कहूँ?
कितना सुनूं?
किसकी सुनी
समझा नहीं;
तो भी कहूँ,
सीखा अतुल
समझा बहुत.
पर प्रश्न मेरे,
हरदम रहे,
चुप-चाप; एकल,
अनुत्तरित.

यह शोर सब,
शब्दों मे ही,
बहता रहा.
हर ओर से,
हर छोर से,
कोई ना कोई,
कुछ ना कुछ,
बोला किया,
कहता रहा.
एक एक निमिष
अनवरत.
जीवन सतत्.


शिशिर सोमवंशी

Monday, September 26, 2011

आओ लौट चलें

वो शांत वृक्ष/
उनके गहरे हरे पत्ते/
पसरी हुई पगडंडी पर/
रह रह के उभर आते/
वो बैंगनी से फूल/
खिल खिलाती नदी/
और उसकी धार में/
गुदगुदाहट से/
हंस हंस के लोटते/
गोल सफेद पत्थर.....
उन्ही पतों पर/
वहीं रहते हैं.
उसी तस्वीर मे/
हर रूप- हर रंग मे/
बसते हैं अभी.




आओ लौट चलें/
कि वो भागे नही/
हमारी तरह/
हम से कहते हैं/
माँ ने बच्चों के घर/
लौट के आ जाने पर/
कुछ कहा है कभी?

-शिशिर सोमवंशी
[देहरादून से दिल्ली की शताब्दी रेल से यात्रा मे २४ सितंबर २०११.]

Thursday, September 1, 2011

लिफ़ाफ़ा


मैंने कई बार कहा
मैं उजला,साफ़ काग़ज़,
मुझ पर लिखो
कुछ ऐसा जो
कोई देखे, सराहे और
सहेज़ कर रखे.
जैसे सदियों की बचत;
मेहनत की ख़री पाई.

समय ने किस की सुनी,
मैं बन के रह गया
एक ऐसा लिफ़ाफ़ा
जिस पर
जिसका जो मन आया,
वैसी क़ीमत का,
टिकट चिपका दिया;
और ऐसी मंज़िलों का,
पता घसीट दिया;
जो मेरी न थीं.

जहाँ लिफ़ाफ़ा तो
पहुँचता रहा....
मैं नही-
इतने बरसों मे,
इतने सालों मे,
मेरी बारी ही थी;
जो नही आई.

इसको पढ़ना और
भूल जाना तुम,
दिल पर अपने,
न बोझ लाना तुम,
ज़िंदगी बीता करती है
कई बार यूँ ही-
अपने मन का ,
नही होता हरदम.

आज फिर हंस के
निकलने का दिन है
राह मे बिखरें हैं;
वो नही मोती-माणिक
काँच के टुकड़े हैं;
चुभती है तो क्या-
ख़ुद के सपनों की
ये कमाई.

-शिशिर सोमवंशी

Tuesday, August 16, 2011

तुम्हारी आखों मे मेरे रंग


मैं वही तस्वीर हूँ,
जिसे बनाते बनाते,
तुम्हारा मन उचट गया.
रंग वहीं आस पास थे,
तुन्हे दिखने बंद हो गये.
कोई रंज़ नहीं;
जो मैं पूरी न हुई.
जो पूरी ही हो जाए-
वो ज़िंदगी कहाँ?

ये जो भी है,
झूठी-सच्ची, कच्ची-पक्की..
और अधूरी सी सही-
तुम्हारी है.

एक बात कहूँ तुमसे?
कुछ देर को रंगों,
की तलाश को भूल,
कूची को किनारे कर,
अपने हाथों से:
बना दो मुझको.

सजाओ इतना ही-
कि सह सकूँ मैं भी;
जो यह बदरंग है;
धूमिल सा है-
मेरा अपना एक,
रंग ही तो है
चीज़ अपनी है-
मुझे प्यारी है.

-शिशिर सोमवंशी

Wednesday, July 27, 2011

तुम और मैं


वो भी तुम्ही हो/
ग्रीष्म की/
तप्त दोपहर/
जो बीतते बीतते/
देर तक ठहरी/
बिना आमंत्रण अनायास/
चुपके से चली आई/
और शीतल कर गयी/
वो सांझ-
तुम्ही हो.

चमक कर/
फैली हुई/ये धूप/
तुम्ही हो/
झिझक कर/
सिमट गयी/
थी जो रात.

तुम्ही हो/
हर रंग/
हर घटना/हर मौसम;
मेरा बसंत भी/
शिशिर भी/
मेरी भटकन/
मेरी मुक्ति;
अतीत, व्यतीत/
और वर्तमान/
मुझमे घुला/
सब रस/
मुझसे बँधी/ हर बात.

तुम्ही सब कुछ हो-
मैं तो बस/
वो समय हूँ;
जो तुम्हे छू कर
यूँ ही निकल गया;
क्यूँ कहते हो कि-
मैं बदल गया.

शिशिर सोमवंशी