Saturday, August 22, 2015

अपनी मित्रता

इतनी भी खूबसूरत नहीं,
यह ज़िंदगी,
जितनी तुम जताते हो।
मधुर स्वर में
सत्यता का,
छद्म आवरण पहने 
अपनी तुच्छता
की ही तुष्टि करती
तुम्हारे हित की
बात नहीं जो
अवसर मिलते ही 
तीव्रता से दोहराते हो । 

या धुएँ का
यह अर्थहीन छल्ला-
जो तुमने हवा
मे रचा है अभी।
वैसे ही जैसे
कुशलता से रच लेते हो,
अपने अनुमानों से
दूसरे का चरित्र।
बिना समझे सर्वस्व
समझ जाने का
यह ढोंग मेरे मित्र,
कैसे कर जाते हो?

कई बार आक्षेप, 
उतना द्रवित एवं
विचलित नहीं करते,
जितना यह कि
कहने वाला कौन था।
जब अनुपस्थिति में,
किसी आरोप ने
मुंह खोला तब,
किसका प्रतिवाद हुआ,
कौन सुनकर मौन था।

अंतिम शब्द तक,
कह के, सुन के,
अंतिम सीमा तक
अपने कल्पित
ताने बाने बुन के, 
अंतरात्मा को इतना
निर्मल और निर्भय
कैसे रख पाते हो?

ज़िंदगी हमारे अहम,
हमारे सस्तेपन से
मान नहीं जाती।  
बस लगता है हमे
ऐसा कई बार।
आज के बाद,
जब मिलो इससे
इतना सोचो कि
तुम ज़िंदा हो इसमे,
ये तुम में नहीं.

मुझसे मिलने
तुम चले आना,
पहले की तरह,
मुझे पता है
बहुत पहले से-
यह मित्रता,
यह जुड़ाव और
अपनापे का भाव
मुझसे है
ये तुमसे नही।  

मैं मान जाऊंगा
पुनः वह मोहक
मुस्कान और वही
अतिरिक्त मिठास
वाणी की लेते आना,
जो तुम सहज ही
संग ले आते हो। 

शिशिर सोमवंशी

वह अद्भुत पल

आज उस एक
अद्भुत पल के बाद,
हुआ क्या विशेष है,
वो मुझे और भी
सुंदर लगने लगा। 

स्मृतियाँ उसकी
पहले भी अभिराम थीं,
हमेशा से ही-
मधुरिम छवियों में जीवंत ।
हृदय के अभिलेखों में
तीव्रता से अंकित ,
स्वास के स्वरों में
छंद और ताल से रसवंत ।
आज उस एक
अद्भुत पल के बाद,
हुआ क्या विशेष है,
वो मुझे उन स्मृतियों से
बेहतर लगने लगा। 

यूं भी होता है
जीवन में कदाचित ,
एक क्षण उस से भी
भव्य हो जाता है।
मैंने जिया वही क्षण,
उसके स्नेह से रंजित । 
सानिध्य से ओत प्रोत,
उसकी विलक्षण कल्पना
उसके द्वारा रचित  एवं
उस से ही परिभाषित ।
आज उस एक
अद्भुत पल के बाद,
हुआ क्या विशेष है,
वह छूटा हुआ रास्ता,
पुनः मुझे जागृत 
स्वप्नों का स्वर्णिम
नगर लगने लगा।

शिशिर सोमवंशी
 

Wednesday, August 19, 2015

तुम्हारा चयन

क्षमा करना
मुझे मेरे प्रेम,
यदि मैं याचक बन
मांग बैठूँ तुमको।
याचना पर दया
भर नहीं करना,
संवेदना भी नहीं,
शब्दों के सहारे
बात को दूसरी
अन्य दिशा दे देना, 
अथवा मौन रह जाना। 

मैं तो चाहूँगा ही
तुम्हें सर्वथा सम्पूर्ण-
आदि से अंत तक। 
नितांत स्वाभाविक
होगा ये आग्रह मेरा,
प्रारब्ध के भोग्य,
जन्म जन्मांतर के
सतत संघर्ष में
जाने कितनी
आकाशगंगाओं में
दिशाओं, दिगंत
और अनंत तक।

कठोर है मेरे प्रति,
किन्तु सत्य
इतना सा है,
हर आहट पर
हृदय के द्वार तो
खोले नहीं जाते।
जो भाग्यशाली
बिना प्रयास,
बिना याचना
तुम्हारे संसर्ग की
विशिष्ट सृष्टि में उतरे।
आवश्यक है
वह विशेष नाम तुम्हारे
निजी चयन से उभरे।
      शिशिर सोमवंशी

उपस्थिति का शुभत्व

शुभ शगुन है वह
ज़िंदगी के लिए,
अपनी उपस्थिति
मात्र के शुभत्व से 
मुझसे कहती हुई- 
तुम भी महत्वपूर्ण हो,
तुम्हारा होना भी
अर्थ रखता है।  

वही जब न हो
ज़िंदगी कुछ और नहीं
दिन भर की
थकन लगती है। 
आँखों में ऊष्णता
साँसों के आरोह
और अवरोह में
घुटन लगती है।
किन्तु इतने पर भी
नींद भरी आँखों में,
पलकों को
बंद करते ही
जिस क्षण वह
नज़र आए ,
तृप्त हो जाती है 
आत्मा की क्षुधा मेरी।

तभी उस से मेरा 
मूक संवाद
फूटता है और
उससे उपकृत हृदय,
उसके आभार और
अपनत्व की अनुभूति
देर रात्रि तक
बिना प्रयास बताता है-
मेरा प्रेम छलक
उठता है रह रह कर
मेरे संदेश में। 
यही कि वो भी 
कितना मूल्य रखती है
सोच के अनछुए
किनारों पर,
जो नितांत मेरे हैं,
इस जन अरण्य में,
हर सामान्य एवं
विशिष्ट परिवेश में। 

सुनकर सब मेरा कहा
वह समझाते हुए
मद्धिम स्वर में
कानों में कहती है
मुझे सब मालूम है,
अब सो जाओ...
सोने दो मुझे।
घनघोर विभा में भी
चाँद का छोटा टुकड़ा
सूरज सा दमक 
उठता जब है। 
थोड़ी सी अपने ऊपर
पूरी उसके ऊपर
हो जाती है श्रद्धा मेरी। 

शिशिर सोमवंशी

Monday, August 10, 2015

विश्वास की मर्यादा

अपनी प्रकृति मैं कैसे
परिवर्तित कर सकता हूँ?
प्रथम तो मेरा अनायास
परिवर्तन  संभव नहीं,
बिखरी हुई धूल को
गूँथ के नयी प्रतिमा
गढ़ने में समय लगता है।
दूसरे समय ने भी,
किसी पराए की तरह
मुझे कभी छुआ नहीं,
मेरा जीवन पलों और
घड़ियों से गुज़र कर भी
उनकी परिधि का हुआ नहीं।
तुम्हारे विश्वास की मर्यादा
रखने के लिए हो जाना था।
काल के चक्र में मुझ
अकिंचन को खो जाना था। 

यह तो तुम मनोगे ही
तुमसे भेंट,वह प्रेम,यह विरह
एक मधुर संयोग-
एक अनमोल अनुभूति.
किंतु जैसा तुमने कहा
जीवन की क्रूर वास्तविकता,
किसी तरह जी लेने की चेस्टा
में किए व्यावहारिक अपराध 
हर संयोग, हर अनुभव
पर भारी पड़ जाते हैं। 
कोई भी घटना
कोई भी गतिविधि
जब तक वर्तमान की
संज्ञा में बसती है,
भाव-सिंधु उफनता
छलकता रहता है।
अपने निकट के परिवेश  को
सराबोर कर देता है.
पर बीत जाता है वह भी।
बीतना ही निश्चित है,
वर्षों की व्यर्थ छल क्रीडा से
निस्संदेह त्वरित- स्वीकृत 
अंत ही उचित है।
मैं क्यूँ बीता नहीं?
तुम्हारे विश्वास की मर्यादा
रखने के लिए हो जाना था। 
काल के चक्र में मुझ
अकिंचन को खो जाना था।

इतने पर भी मेरा जीवन
दारुन दुखों के  मध्य
यदा कदा परिलक्षित
तथाकथित आह्लाद
से ही परिभाषित होता है।
यह ढीठ मेरे सतत अश्रु-पात
की धाराओं में बहा नहीं।
इसके होने का कोई
विशेष अर्थ नहीं था,
तथापि यह नित नवीन
स्वरूपों में मुझसे
संभाषित होता है।
देह के पोषण और आजीविका
के कठिन उपक्रमों में 
साँसों का टूटना, थम जाना
चाहे से भी स्थायी न हुआ। 
उपेक्षा, तिरस्कार और आघात 
सह कर धराशायी नही हुआ।
तुम्हारे विश्वास की मर्यादा
रखने के लिए हो जाना था।
समय के चक्र में मुझ
अकिंचन को खो जाना था।

     शिशिर सोमवंशी